चुनावों में जीतने के लिये अमर्यादित भाषा का प्रयोग जरुरी…?

भारतीय राजनीति में चुनाव के समय पर जनता से सरोकार वाले मुद्दे गौड़ हो जाते हैं।  चाहे यूपी का चुनाव हो,लोकसभा का चुनाव या फिर अब गुजरात में चल रहे चुनावी में भी यही हो रहा है। गुजरात विकास का मॉडल लोकसभा में प्रमुख मुद्दा रहा था। गुजरात चुनाव के शुरुआत के दौर पर कांग्रेस ने जनता की जरूरतों व विकास को लेकर बीजेपी पर हमलावर हुई। लेकिन जैसे जैसे चुनावी सरगर्मी आगे बढ़ी , वैसे वैसे जनता के मूलभूत मुद्दे गायब होने लगे। सियासत जातियों को और बढ़ने लगी । दलित,पाटीदार जातियों की आरक्षण राजनीति हावी होने लगी। उधर मोदी, राहुल के द्वारा मंदिरों पर इनकी  परिक्रमा ने सुर्खियां बटोरने लगी। जाति से धर्म की ओर मुड़ने लगी।  फिर क्या था सियासत ने मुगल काल का भी दौरा किया जहाँगीर ,शाहजहाँ व औरंगजेब की भी आमद हुई। लेकिन ये सफर अभी नही थमा। ये सियासी सफ़र गुजरात के मान सम्मान से जुड़ा । इसके कारक रहे 2014 विवादित बोल के महारथी मणिशंकर अय्यर ने एक बार फिर मोदी को चाय वाला के बाद नीच कह कर गुजरात चुनाव में हलचल मचा दी। और बीजेपी व पीएम मोदी ने इस विवादित बोल को लपकने में देर नही लगाई। और इसे गुजरात की अस्मिता से जोड़ने पीछे नही रही।और मणिशंकर अय्यर के इस बयान कांग्रेस को बैकफुट में ला दिया। कांग्रेस ने देर न करते हुए अपने इस वरिष्ठ नेता से न सिर्फ माफ़ी मंगवाई बल्कि निलंबित कर डैमेज कंट्रोल करने का प्रयास भी किया। क्योंकि उन्हें पता है कि मोदी के प्रति अपशब्द का प्रयोग गुजरात की जनता पसंद नही करती है। इसका उदाहरण 2007 में सोनिया गांधी का मोदी को मौत का सौदागर कहने भर से गुजरात चुनाव हार रही बीजेपी को बड़ी जीत हासिल दिल दी। यही काम 2014 में मणिशंकर अय्यर का चाय वाला बयान लोकसभा में गुजरात की सभी सीटों पर जीत दिलाई । मणिशंकर अय्यर ने वही गलती पुनः दोहरा दिया है। इसी को भांपकर कांग्रेस ने कार्यवाही में देरी नही लगाई। अब देखना है इस बयान का चुनाव पर कितना असर डालेगा परिणाम आने पर पता चलेगा। मामला इतने पर ही नही रुका इस गुजराती राजनीति में पाकिस्तान की दखलन्दाजी दिखी ,जिसमें प्रधानमंत्री मोदी का आरोप कि पाकिस्तान से मिलकर मणिशंकर ने मुझे मारने की सुपारी दी । वही मणिशंकर अय्यर के घर पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद करजई, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व पाकिस्तान उच्चायुक्त के साथ गोपनीय बैठक की गूंज गुजरात तक सुनाई पड़ी। उधर अहमद पटेल को कांग्रेस सरकार बनने पर मुख्यमंत्री बनाने की की चर्चा पाकिस्तान में वहाँ की हुकूमत में होना भी गुजरात चुनाव को प्रभावित कर रहा है। इसी से ये पता चलता की गुजरात चुनाव की अहमियत की देश ही नही वरन् विदेशों में भी चर्चा हो रही। हो भी क्यों न प्रधानमंत्री मोदी का गृह राज्य जो है।  इस लिए कांग्रेस भी जिग्नेश,अल्पेश व हार्दिक पटेल की तिकड़ी व बीजेपी सरकार की ऐंटी कंबेशी के बल पर बीजेपी ही नही बल्कि इसी आड़ में मोदी को भी मात देने की हरसम्भव प्रयास कर रही है। फिलहाल मेरा इतना कहना है कि ये वोट की राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों को कितना गिरा देती है ,अच्छी बात नही है। कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ने अपनी भाषा की मर्यादा को तोड़ने में देर नही लगाई। बस फर्क ये था कोई कम ,कोई ज्यादा। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश इस परम्परा को ख़त्म करना चाहिए और एक स्वस्थ्य राजनीति को बढ़ावा देना राजनेताओं का धर्म और संविधान के प्रति विश्वास जताने जैसा होगा और इंदिरा गांधी ,अटल बिहारी बाजपेयी की पक्ष-विपक्ष की राजनीति परम्परा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

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