वस्त्रों के आवरण से दबी संस्कृति

बबीता जैन
एक दिन सुबह की नींद में खलल पड़ोस के घर से आती आवाजों से पड़ा। अलसाई सी मैं उठकर कमरे से बाहर आई तो समझ में आया कि एक पिता अपनी बेटी को हाफ पैंट पहनकर अपने भाई के सामने जाने के लिए खरी खोटी सुना रहे हैं। भारतीय संस्कृति में ऐसे कपडे़ को असभ्यता की निषानी बताकर अपनी पत्नी को भी बेटी को संस्कारित नहीं करने के दंड स्वरूप गालियों की बौछार से नहला रहे हैं।
पूरा माजरा समझने के लिए आंखें मलते हुए बालकनी में आई तो सामने का नजारा मुझे अचरज में डाल रहा था, जो पिता अपनी बेटी को संस्कारहीन बता रहा था उसने स्वयं अपने शरीर पर वस्त्रों के नाम पर मात्र एक निंकर धारण कर रखी थी। और जिस बड़े भाई के सामने बेटी को तहजीब से रहने का पाठ पढ़ाया जा रहा था उसने भी एकमात्र निंकर पहन रखी थी। और वह मासूम बेटी जो पिछले आधे घंटे से जिल्लत का सामना कर रही थी उसने बड़े सलीके से एक कुर्ता और उसके नीचे घुटनों तक हाफ पैंट पहने हुआ था। और वह मां जो चुपचाप अपने पति के क्रोध रूपी अंगारों को झेल रही थी, उसने सिर पर पल्लू करके बड़े अदब से साड़ी पहन रखी थी।
भारतीय संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देकर एक लड़की के पहनावे पर कीचड़ उछालना हमारे देष में आम बात हो गई है।
हम इसमें हमारे देष के राजनेताओं की बात करलें या फिर हमारे देष के राजनेताओं की बात करलें या फिर हमारे अपने ही रिष्तेदारों की बातों की गहराई में चले जाएं जहां हर कोई एक लड़की पर होने वाले जुल्मों के लिए उसके पहनावे को सवालों के कटघरे में खड़ा करता नजर आ जाएगा। और त्रासदी तो यह है कि केवल पुरूष ही नहीं एक महिला भी एक महिला पर कीचड़ उछालने से पहले नहीं सोचती कि, ’छीटे मेरे मुंह को भी गंदा कर सकते हैं’।जब संस्कृति के नाम पर एक लड़की सवालों के कटघरे में आती है तो जाने अनजाने एक लड़का भी इन सवालों से बच नहीं पाता है। लेकिन दुख की बात है कि कभी कोई इन सवालों का जवाब ढूंढने की जहमत नहीं उठाता।
प्राचीन भारत पर एक नजर डाली जाए तो, तब का पहनावा आज के पहनावे से सर्वदा भिन्न था। सिर ढककर रखने की मान्यता स्त्री और पुरूष दोनों के लिए ही समान रूप से मान्य थी। दोनों के ही पहनावे में गहनों का विषेष महत्व था। पुरूषों के लिए धोती कुरता और महिलाओं के लिए घाघरा चोली या फिर साड़ी, ज्यादातर हिंदी भाषी क्षेत्रों का मुख्य परिधान था। लेकिन जैसे-जैसे बक्त गुजरता गया पुरूषों के शरीर से एक-एक करके यह सभी संस्कृति के चिन्ह गायब होते गए।
पाष्चात्य संस्कृति में हम कुछ इस तरह रचते बसते चले गए कि कब धोती कुरते की जगह पैंट और कमीज ने ले ली हमें पता ही नहीं चला और कब यह एड़ी तक झूलता पैंट सुविधा अनुसार छोटा होकर घुटनों तक और फिर इससे भी छोटा होता चला गया ऐसा इतिहास में कही हमें लिखा हुआ नहीं मिलेगा।
सिर की पगड़ी कब गायब हुई यह भी हम नहीं जानते, कब यह सिर को ढक कर रखने की परंपरा शादियों में दिखावे के काम आने लगी यह भी हम नहीं जानते।सवाल यह नहीं है कि पुरूष वर्ग ने अपना पारंपरिक पहनावा क्यों छोड़ा?
सवाल यह भी नहीं है कि संस्कृति के यूं लुप्त हो जाने पर भी आज तक हमने विवाद क्यों नहीं किया? सवाल यह कि जब स्त्री वर्ग ने अपनी कार्यषैली और सुविधा के अनुसार अपने पहनावे में बदलाव लाना चाहा तो इतना शोर शराबा क्यों?
पाष्चात्य वस्त्रों को अपनाने के साथ-साथ एक भारतीय नारी तो आज भी अपनी पुरानी परंपराओं को जिंदा रही है। कष्मीर से लेकर कनयाकुमारी तक या फिर हिमालय की गोद में बसे अरूणाचल प्रदेष से लेकर गुजरात में कच्छ की खाड़ी तक हर स्थान पर स्त्री जाति ने ही पारंपरिक पहनावे के बजूद को आज तक जिंदा रखा हुआ है।
चाहे असम की चादर मेखला हो या फिर राजस्थान की कुरता कांचली, हर प्रदेष में भारत की संस्कृति की झलक हमें देखने को मिल जाएगी लेकिन क्या आपने किसी भी प्रदेष के पुरूष वर्ग को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में पारंपरिक पहनावे को अपनाते देखा है?
बचपन की एक घटना को इस विषय के परिप्रेक्ष्य में रखना चाहूंगी। मेरे दिवगंत दादाजी बनियान पहनकर अपने कमरे से बाहर नहीं आते थे, ’बहू-बेटियों के सामने अदब से जाना चाहिए’। लेकिन आज जब एक पुरूष अर्द्धनग्न अवस्था में यत्र तत्र घूमता रहता है और एक स्त्री से उम्मीद रखता है कि वो पाष्चात्य पहनावे को नहीं अपनाए तो यह बात स्वयं ही दोहरी मानसिकता का परिचय देती है। मानसिकता का स्तर उस समय तो अपनी सारी हदें पार कर देता है जब बलात्कार जैसे कुकृत्यों के लिए भी एक लड़की के पहनावे को दोषी मान लिया जाता है और बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि एक लड़की का पहनावा ही लड़कों को उसके साथ कुकर्म करने के लिए उकसाता है क्योंकि यह पहनावा भारतीय संस्कृति के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता।
इस बार में अपनी हां में राय देने वाले सभी राजनेताओं और बुद्धिजीवी भाइयों और बहनों से बड़ी विनम्रता से एक प्रष्न पूंछना चाहूंगी कि क्या एक पुरूष का पहनावा भारतीय संस्कृति के मापदंडो पर खरा उतरता है? आजकल के मेरे नवयुवक भाई लोअर वेस्ट के नाम पर जो जींस पहनते हैं उसे देखकर अच्छे-अच्छों की नजरें शर्मसार हो जाएं, लेकिन क्या वो इसलिए सही है क्योंकि पुरूषवर्ग पहन रहा है।
दूसरी बात पहनावे को बलात्कार का एक अहम कारण मानने वाले महानुभवों से पूछना चाहूंगी कि पांच बर्ष और सात बर्ष की बच्चियों के साथ जब यह जघन्य पाप किया जाता है तब भी क्या पाष्चात्य पहनावा बीच में आता है। इतना ही नहीं हमारे गांवो में रहने वाली सीधी सादी बहनों के साथ जब यह पाप किया जाता है वो तब भी क्या उनका सिर से लेकर पैर तक उनके शरीर को छिपाता हुआ उनका पहनावा बीच में आता है।
बहुत पीड़ा होती है जब एक पुरूष तो पुरूष एक महिला भी वस्त्रों को सवालों के कटघरे में खड़ा कर देती है और इतना ही नहीं हमारे सुसभ्य समाज में तो एक बेटी और एक बहू के लिए निर्धारित वस्त्रों के मापदंड भी अलग-अलग हो जाते हैं। 21वीं सदी के दौर का भारत उस समय फूट फूटकर रोता है जब देष को बुलंदी तक पहुंचने की ताकत रखनेवाली हमारी माताएं और बहनें अपनी ही किसी बहन के सिर पर से उतरे पल्लू के किस्से एक दूसरे को रस लेकर सुनाती हैं।
ये वे ही माताएं-बहनें होती हैं जिनके तथाकथित पति, बेटे और भाई बड़ी शान से अर्द्धनग्न अवस्था में इधर-उधर घूमते हैं। लेकिन अगर इनकी कोई बहन सम्मानजनक पाष्चात्य वस्त्रों में नजर आए तो इन्हें फूटी आंख नहीं सुहाती।
हमें हमारे सम्मान को बनाए रखने के लिए हमारे पहनावे की तरफ उठी नजरों को उन्हीं की नजरों में गिरने लायक बनाना होगा। किसी भी देष और समाज की संस्कृति को अक्षुन्न बना कर रखने में बस्त्रों से ज्यादा वहां के परिवेष से मिले संस्कार अहम भूमिका निभाते हैं। अगर कोई सिर से लेकर पैर तक शरीर को ढक कर अपने जुबान को बेलगाम छोड़ देता है तो वे कहीं की भी संस्कृति को धूमिल करने में सबसे बड़ा कारण बनता है।
आज विश्व के मानचित्र पर भारत वर्ष के तथाकथित नेताओं के बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय पर असंवेदनशील बयान जाते है तब हमारी भारत माता अपने ही बेटों द्वारा अपनी ही बेटियों के ऊपर होने वाले अत्याचार को देखकर आंसू बहाती है ए तब हमारी सांस्कृतिक धरोहर कहाँ चली जाती है घ् क्या हमारी संस्कृति में केवल वस्त्रों का ही मापदंड है ए किसी की जुबान से निकले अशिष्ट शब्दों का कोई मापदंड नहीं है घ्
जब तक हमारी बहनों को अपमानित करने के रास्ते तलाशे जाते रहेंगे तब तक हमारा देश अपमानित होते रहेगा ए हमारी सुद्रढ़ संस्कृति का ऐसे ही अपमान होते रहेगा द्य
क्या हमें इस बारे में सोचना नहीं चाहिए ……..?

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