अस्तित्व को मजबूती प्रदान करने व समानता के अधिकार की लडाई लड रही है

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस………………….
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नीरज सिंह
दुनिया की वह आधी आबादी जोकि आज भी अपने अस्तित्व को मजबूती प्रदान करने व समानता के अधिकार की लडाई लड रही है । आज अपना दिवस मना रही है। यानी हर वर्ष की भांति इस बार भी आज के दिन 08 मार्च को महिला दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाया जा रहा है। क्या एक दिन महिला दिवस मना लेना ही काफी है। औपचारिकता भर से ही महिलाओं के कल्याण का रास्ता साफ हो जाता है कितनी दुखःद बात है। बडे कार्यक्रम करके बडे बडे लच्छेदार भाषणों एवं नारों से उनकी स्थित में सुधार हो जायेगा! ये यक्ष प्रश्न समाज के सामने खडा है। बिल्कुल नही इस प्रकार महिलाओं के स्तर में सुधार नही होगा। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस व शान्ति दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 1977 में आठ मार्च के दिन मनाने का फैसला लिया था। जोकि हर वर्ष इसे मनाया जाता है। इससे पूर्व पहली बार अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने 28 फरवरी सन् 1909 महिला दिवस मनाया था। कारण था कि वहां मलिाओं को मताधिकार से दूर रखा गया था। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मनाने वाले दिवस जिसमें महिलाओं के सम्मान व अधिकारों के लिए व्यावाहिरक सम्बंधों को बेहतर करने के लिए महिलाओं को जागरूक करने के कार्यक्रम सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर होते हैं। जिसमें स्त्री शक्ति एवं नारी शक्ति पुरस्कार से महिलाओं को प्रोत्साहित किया जाता है। अब सवाल ये हैं इनसे कितना फायदा होता है !आज भी पूरे विश्व में महिलाओं का जीवन स्तर बहुत ही खराब है विशेषकर खाडी देशों में जहां इन्हे भोगमात्र की वस्तु माना जाता है, शिक्षा का स्तर भी न के बराबर ही है। भारत में भी महिलाओं के स्तर सुधार में एक सर्वे एजेंसी के आकलन में निचले पायदान पर है। आज भी हमारे यहां एक तरफ तो महिलाएं इस पुरूष प्रधान देश में कन्धा से कन्धा मिलाकर चलने वाली भी हैं। मलिाएं किसी मायने पुरूषों से कमतर नही हैं।इसका सबूत हर क्षेत्र में भागीदारी और उन क्षेत्रों में परचम लहराना है, आटो चालक से लेकर हवाई जहाज पायलट तक हैं। लगभग सभी क्षेत्रों में भागीदारी है,चाहे कारपेट,सेना, मीडिया,राजनीति,विजनेस,शिक्षा या फिर स्वयं का कार्य हो। लेकिन इनके भागीदारी का प्रतिशत नाम मात्र का है। वही देश महिलाओं असुरक्षित महसूस करना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। किले की प्राचीर से हमारे राजनेता दम्भ भरते हैं कि देश बहिन बेटियां अपने को सुरक्षित न समझे। लेकिन क्या ऐसा हो पा रहा है निर्भयाकांड, अभी दो दिन पूर्व आसाम के दीमापुर नगा महिला के साथ हुए रेप कांड ने देश को कलंकित करने का काम हुआ। चाहे सरकारे जितना भी प्रयास क्यों न कर ले। इसके लिए सबसे पहले अपनी एवं समाज की सोच बदलने की आवश्यकता है। तभी हम इनमें गुणात्मक सुधार ला सकते हैं। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा एक विज्ञापन अखबारों में छपा है कि सशक्त महिलाएं,भारत सशक्त । सच भी है क्योंकि इनकी आधाी भागेदारी है, अगर ये सशक्त नही तो भारत सशक्त कैसे होगा। मजबूत भारत का सपना ही सपना हो जायेगा। महिलाओं को सम्मान देना न कि उपभोग की वस्तु समझना व उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना। तुच्छ सोच से निकलकर उन्हें समाज अपने बराबरी दर्जा व सम्मान देना ही सही मायने में महिला दिवस सार्थक होगा।

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